एक बार श्री कृष्ण को राधा रानी की परीक्षा लेने की इच्छा हुई। तो उन्होंने अपना भेस बदल एक ग्वालिन का रूप बनाया और बरसाने, जहाँ राधारानी रहती थी, चले गए। जब राधारानी ने उस ग्वालीन को देखा, तो वह अत्यंत प्रसन्न हो उठीं। उनके मन के हर्ष का कारण यह था कि उस ग्वालिन में उन्हें श्री कृष्ण की छवि दिख रही थी। उन्हें लगा कि श्री कृष्ण से मिलती छवि वाली ये ग्वालिन अवश्य वृन्दावन से आई उनकी कोई बहन या संबंधी होंगी।
राधारानी ने उस ग्वालिन से कहा “बहन! तुम अत्यंत सुंदर हो! तुम्हारा रूप देखकर तो चंद्रमा और सूर्य भी शर्मा जाएँ। तुम्हारे प्रति मेरे मन में अपार श्रद्धा हो रही है। मेरा मन अत्यंत आनंदित हो रहा है। तुम मेरे श्याम सुंदर सी दिखती हो!”
ग्वालिन का भेस धरे श्री कृष्ण बोले “तुम राधा हो ना? मैंने तुम्हारे सौंदर्य और गुणों के बारे में बोहोत सुना है, इसलिए मिलने की इच्छा हुई और मैं स्वयं ही यहाँ खिची चली आई। तुम्हारे दर्शन से मेरे मन को अपार शांति की अनुभूति हुई है”। इतना कह कर वो उदास हो गए।
राधारानी उनकी उदासी देखकर बोली”बहन! ऐसी क्या बात हुई कि तुम उदास हो गयी?”
श्रीकृष्ण ने कहा “बहन! एक दिन मैं दही बेचने जा रही थी कि रस्ते में ब्रज के छोरे कृष्ण ने मेरे साथ छल किया। उसने मेरी मटकी फोड़ डाली और मुझसे माफ़ी भी नहीं माँगी। उसने अपने ग्वाल मित्रों के संग मिल के मेरी बोहोत हसी उड़ाई। जाती का तो ग्वाला है, ऊपर से रंग काला है, और इतना अभिमानी! और तुम हो कि उसकी प्रशंसा करती हो, उसकी छवि से आनंदित होती हो। उससे प्रेम करती हो जब कि वो तो तुम्हारे योग्य भी नहीं!”
ऐसे वचन सुन राधारानी बोली “ऐसे वचन न बोलो सखी। मैं उनके बारे में ऐसे शब्द नहीं सुन सकती। तुम्हारे धन्य भाग कि उन्होंने तुम्हारी मटकी फोड़ी, इस बहाने उन्होंने तुम्हें दर्शन दिए और तुमपर कृपा बरसाई। उनके मंगल दर्शनों के लिए तो सभी देवता भी तरसते हैं। तुम ग्वालों को छोटा समझती हो जब कि उनके जैसा कोई धन्य नहीं, जो तन मन से श्री कृष्ण की सेवा में लगे रहते हैं और उनके साथ वन में धेनु चराते हैं। सखी तुमने उन्हें काला कहा, उनके श्याम रंग के समक्ष तो गैया भी अपना गौर रंग भूल जाती है। वो ही मेरे प्राण धन है, मेरे सर्वस्व हैं।”
राधारानी के अलौकिक प्रेम को दर्शाते शब्दों को सुन श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गए और अपनी प्रिया का नाम लेकर उन्हें पुकारा “राधे!” राधारानी ने जैसे ही अपने श्याम सुंदर को अपने समीप पाया, वो भाव विभोर होकर अपने प्रियवर के हृदय से जा लगीं।
जय जय श्री राधे
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