देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जाहि ।।१ ।।
(आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्ति के लिए )
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्रयदु:खभयहारिणी का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ।।२ ।।
( दारिद्रयदु:खादिनाश के लिए )
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।।३ ।।
( सब प्रकार के कल्याण के लिए )
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।४ ।।
( विपत्ति नाश के लिए )
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ।।५ ।।
(भय – नाश के लिए मंत्र। )
रोगानशेषनपहंसि तुष्टा
रूष्टातु कामान सकलानभीष्टान।
त्वाममश्रिताम न विपन्नाणाम्
त्वाममश्रितां ह्राश्रयतां प्रयान्ति ।।६ ।।
( रोग- नाश के लिए )
सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।७ ।।
( बाधा – शांति के लिए )
इति सप्त श्लोकी दुर्गा सम्पूर्णम् ।।